मौसम में अल-नीनो (El Niño) के संभावित प्रभाव को देखते हुए इस बार खरीफ सीजन में मानसून के देर से आने, जल्दी समाप्त होने और फसल अवधि के दौरान खंड वर्षा (रुक-रुक कर कम हिस्सों में बारिश) होने की आशंका जताई जा रही है। इस अनिश्चितता से फसलों को बचाने और किसानों को नुकसान से सुरक्षित रखने के लिए कृषि विभाग ने एक व्यापक और जरूरी सामयिक सलाह (Advisory) जारी की है।
कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए पारंपरिक तरीकों में बदलाव लाएं और कम पानी में तैयार होने वाली उन्नत किस्मों को प्राथमिकता दें।
धान की रोपा पद्धति छोड़ें, सीधी बुवाई से होगी ₹5000 की बचत
विभाग द्वारा जारी सलाह में किसानों को धान की रोपा पद्धति के बजाय धान की सीधी बुवाई (Direct Seeding of Rice) को प्राथमिकता देने को कहा गया है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, सीधी बुवाई अपनाने से:
- 20% पानी की बचत होती है।
- खेती की लागत में प्रति एकड़ लगभग ₹5,000 तक की कमी आती है।
- फसल सामान्य से 12 से 15 दिन पहले पककर तैयार हो जाती है, जिससे मानसून जल्दी खत्म होने पर भी नुकसान नहीं होता।
ऊंचे खेतों (उच्चहन भूमि) में धान की जगह लें दलहन-तिलहन
कम वर्षा की स्थिति से निपटने के लिए विभाग ने किसानों को खेतों में मजबूत मेड़बंदी कर वर्षा जल का संचयन (Water Harvesting) सुनिश्चित करने की सलाह दी है। इसके साथ ही, ऊंचे और कम पानी वाले खेतों (उच्चहन भूमि) में धान लगाने के बजाय वैकल्पिक फसलों को चुनने पर जोर दिया गया है:
- दलहनी फसलें: अरहर, मूंग और उड़द।
- तिलहनी फसलें: मूंगफली, तिल, रामतिल और सोयाबीन।
कतार पद्धति और समय पर बुवाई है जरूरी
कृषि विभाग के मुताबिक, फसलों की बुवाई हमेशा कतार पद्धति (Line Sowing) से करनी चाहिए। इससे खेतों में नमी का संरक्षण होता है, खरपतवार (नदी-घास) नियंत्रण आसान होता है और पौधों की ग्रोथ बेहतर होती है।
बुवाई की समय-सीमा (Timeline):
- जुलाई के अंत तक: मूंग और उड़द की बुवाई हर हाल में पूरी कर लें।
- अगस्त माह में: तिल, सूरजमुखी और मध्यम अवधि में पकने वाली अरहर की बुवाई की जा सकती है।
बीजोपचार और खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान
फसलों को बीमारियों से बचाने के लिए बुवाई से पहले बीज उपचार (Seed Treatment) करना अनिवार्य बताया गया है। वहीं, खेतों में खरपतवारों को रोकने के लिए बुवाई के 3 से 5 दिनों के भीतर अनुशंसित मात्रा में अंकुरण-पूर्व खरपतवारनाशी दवाओं (Pre-emergence Weedicide) का छिड़काव करने की सलाह दी गई है। इसके अलावा मल्चिंग, वर्षा जल संचयन और आवश्यकतानुसार पर्णीय पोषण प्रबंधन (Foliar Nutrition) अपनाने की बात कही गई है।
कम पानी में ऐसे करें खाद का सही प्रबंधन
कम वर्षा या सूखे जैसी स्थिति में खाद के इस्तेमाल को लेकर भी विभाग ने खास गाइडलाइन जारी की है:
- कम बारिश की स्थिति में नत्रजन (नाइट्रोजन) उर्वरकों का सीमित उपयोग करें।
- खेतों में सीधे खाद डालने के बजाय 2 प्रतिशत यूरिया घोल या नैनो यूरिया का खड़ी फसल पर पर्णीय छिड़काव (Spaying) करें, जो बेहद लाभकारी साबित होता है।
- दलहनी और तिलहनी फसलों में बुवाई के करीब एक महीने बाद 2 प्रतिशत डीएपी (DAP) घोल का छिड़काव करने की अनुशंसा की गई है।




















