- सुदन गुरुंग, हामी नेपाल नाम से NGO चलाते हैं
- वह कुप्रशासन के खिलाफ SM कैंपेन चलाते रहते हैं
- गुरुंग ने ही पूरे प्रोटेस्ट का प्लान बनाया था
- वह आंदोलन को शांतिपूर्ण रखना चाहते थे
- इसी वजह से उन्होंने छात्रों को यूनिफॉर्म में बुलाया था
- एलीट क्लास के विरोधी के रूप में वह नेपाल में प्रसिद्ध हैं उन्होंने इंस्टा पर लिखा था – 8 सितंबर को नेपाल के युवा उठेंगे और कहेंगे बहुत हो चुका
नेपाल में चल रहे इस अभूतपूर्व जनांदोलन के केंद्र में हैं 36 साल के सुदन गुरुङ। जो “हामी नेपाल” नाम के एक एनजीओे के अध्यक्ष हैं। ये एनजीओ युवाओं के लिए काम करता है। सुदन ने सोशल मीडिया पर प्रदर्शन की रूपरेखा शेयर करते हुए छात्रों से स्कूल यूनिफॉर्म और किताबें लेकर आने की अपील की थी, जिससे यह आंदोलन अहिंसक प्रतिरोध का प्रतीक बन सके। गुरुङ की पहल से शुरू हुई रैलियां इतनी तेजी से फैलीं कि सोशल मीडिया ब्लैकआउट और इंटरनेट प्रतिबंधों के बावजूद युवाओं की भीड़ सड़कों पर उमड़ आई। संसद भवन की बैरिकेड तोड़कर प्रदर्शनका अंदर घुसने लगे, जिसके बाद सरकार के आदेश पर पुलिस ने छात्रों को निशाना बनाकर फायरिंग शुरू कर दी।
सुदन गुरुङ का जीवन भी इस आंदोलन जितना ही नाटकीय रहा है। कभी एक इवेंट ऑर्गेनाइजर रहे गुरुङ की जिंदगी उस वक्त पूरी तरह से बदल गई, जब 2015 के विनाशकारी भूकंप में उन्होंने अपने बच्चे को खो दिया। उसी हादसे के बाद उन्होंने समाजसेवा और नागरिक आंदोलन का रास्ता चुना और “हामी नेपाल” की नींव रखी। यह संगठन पहले आपदा राहत में सक्रिय रहा और बाद में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार-विरोधी अभियानों में कूद पड़ा। धरान में बीपी कोइराला इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ साइंसेज की अनियमितताओं के खिलाफ “घोपा कैंप” आंदोलन से लेकर काठमांडू तक, गुरुङ धीरे-धीरे युवाओं और आम नागरिकों के बीच विश्वास और उम्मीद का चेहरा बन गए हैं। आज गुरुङ को “जनरेशन-जेड की आवाज” कहा जा रहा है, लेकिन उनका आंदोलन सिर्फ युवाओं तक सीमित नहीं है। काठमांडू से लेकर पोखरा, बुटवल, विराटनगर और दमक तक, हर वर्ग के लोग इस संघर्ष में शामिल हुए हैं।
















