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नोबेल शांति पुरस्कार 2025: ट्रंप की उम्मीदों पर फिरा पानी, वेनेजुएला की मारिया कोरिना मचाडो ने जीता सम्मान..

ओस्लो/काराकस: 2025 के नोबेल शांति पुरस्कार का ऐलान हो गया है, जिसने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बार-बार नोबेल जीतने के दावे पर विराम लगा दिया है। यह प्रतिष्ठित सम्मान वेनेजुएला की प्रमुख विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को उनके देश में लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष करने के लिए दिया गया है। नॉर्वेजियन नोबेल कमिटी ने इस निर्णय के साथ स्पष्ट संदेश दिया है कि उसका ध्यान लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और अहिंसक आंदोलन पर केंद्रित है।

​लोकतंत्र की योद्धा मारिया कोरिना मचाडो

​वेनेजुएला में सत्तावादी राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ लोकतांत्रिक आंदोलन की अगुवाई करने वाली मारिया कोरिना मचाडो को ‘लोकतांत्रिक मूल्यों की वैश्विक रक्षा का प्रतीक’ बताया गया है। उन्होंने हिंसा या सशस्त्र विरोध के बजाय शांतिपूर्ण जन-आंदोलन और राजनीतिक संवाद के ज़रिए बदलाव की राह चुनी है।

​नोबेल कमिटी ने उनके इस नैतिक साहस और अडिग नेतृत्व की सराहना की। यह पुरस्कार ऐसे समय में आया है जब वेनेजुएला में लोकतंत्र को लेकर गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं और मचाडो का यह संघर्ष वहां के नागरिक समाज को नई ऊर्जा प्रदान कर रहा है।

​कौन हैं मारिया कोरिना मचाडो?

  • जन्म: 7 अक्टूबर 1967 को हुआ।
  • ​वह एक औद्योगिक इंजीनियर हैं और वेनेजुएला की प्रमुख विपक्षी नेता हैं।
  • 2002 में उन्होंने वोट निगरानी समूह सूमाते की स्थापना की।
  • ​वह वेंटे वेनेजुएला पार्टी की राष्ट्रीय समन्वयक हैं।
  • 2011 से 2014 तक वे वेनेजुएला की नेशनल असेंबली की सदस्य रहीं।
  • ​उन्हें उनके तेवरों और साफ-सुथरी छवि के कारण ‘वेनेजुएला की आयरन लेडी’ भी कहा जाता है।
  • ​उन्हें 2018 में बीबीसी की 100 प्रभावशाली महिलाओं और 2025 में टाइम पत्रिका की 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल किया गया था।
  • ​निकोलस मादुरो सरकार ने उन पर देश छोड़ने पर प्रतिबंध लगा रखा है।
  • ​2024 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए अयोग्य घोषित किए जाने के बावजूद उन्होंने विपक्षी प्राथमिक चुनाव जीता था।

​डोनाल्ड ट्रंप का नोबेल का सपना क्यों टूटा?

​नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा से पहले तक दुनिया की निगाहें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर टिकी थीं, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कम-से-कम 10 बार खुद को पुरस्कार का ‘डिजर्वर’ बताया था। उन्होंने इजरायल-हमास संघर्ष सहित ‘आठ युद्ध खत्म’ करने का श्रेय लेते हुए अपनी उम्मीदवारी को मज़बूत करने की कोशिश की थी। उन्हें पाकिस्तान और रूस के राष्ट्रपतियों सहित कई वैश्विक नेताओं का भी समर्थन मिला था।

​हालांकि, नॉर्वेजियन नोबेल कमिटी ने उनके इन दावों और प्रचार को दरकिनार कर दिया।

ट्रंप को नोबेल न मिलने के मुख्य कारण:

  1. प्राथमिकता में अंतर: नोबेल कमिटी ने स्पष्ट रूप से लोकतांत्रिक संघर्ष और मानवाधिकारों की शांतिपूर्ण वकालत को प्राथमिकता दी, जो अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत और पुरस्कार के दीर्घकालिक लक्ष्यों के अनुरूप है।
  2. नामांकन की समय-सीमा: नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन की अंतिम तिथि आमतौर पर जनवरी के अंत में होती है। इस वर्ष के पुरस्कार के लिए ट्रंप के वे दावे, जो उन्होंने बाद में किए (जैसे गाजा युद्धविराम योजना का श्रेय), नामांकन प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर सके।
  3. दीर्घकालिक प्रयास: नोबेल पुरस्कार आमतौर पर दीर्घकालिक शांति प्रयासों, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और संस्थागत कार्यों को मान्यता देता है, न कि तात्कालिक राजनीतिक हस्तक्षेपों को। कमिटी ने उनके कटाक्षों को नजरअंदाज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि उनका निर्णय केवल अल्फ्रेड नोबेल की इच्छा और कार्य पर आधारित होता है।

​इस घोषणा से यह साफ हो गया है कि नोबेल कमिटी अपने सिद्धांतों पर अडिग है, और विश्व शांति के लिए जमीनी स्तर पर संघर्ष करने वालों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।

​मारिया कोरिना मचाडो को यह सम्मान 10 दिसंबर को ओस्लो में प्रदान किया जाएगा, जिसमें उन्हें एक स्वर्ण पदक और 1.1 करोड़ स्वीडिश क्राउन (लगभग 8 करोड़ रुपये) का नकद पुरस्कार भी मिलेगा।

𝐁𝐇𝐈𝐒𝐌 𝐏𝐀𝐓𝐄𝐋

𝐄𝐝𝐢𝐭𝐨𝐫 𝐇𝐈𝐍𝐃𝐁𝐇𝐀𝐑𝐀𝐓 𝐋𝐈𝐕𝐄 𝐍𝐞𝐰𝐬
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