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किसानों के लिए बड़ी राहत या नई आफत? ₹266 वाली यूरिया बोरी के लिए देने होंगे ₹2400? शिवराज सिंह के बयान ने छेड़ी नई बहस

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का हालिया बयान देश के करोड़ों किसानों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। खाद पर मिलने वाली सब्सिडी को सीधे बैंक खाते में (DBT) भेजने का प्रस्ताव जितना क्रांतिकारी लग रहा है, उतना ही यह किसानों के मन में कई सवाल भी खड़े कर रहा है। आइए समझते हैं कि इस नई व्यवस्था से किसानों को फायदा होगा या परेशानी

फायदे: क्यों यह योजना किसानों के लिए ‘वरदान’ हो सकती है?

  1. कालाबाजारी पर फुल स्टॉप: वर्तमान में सब्सिडी वाली खाद (खासकर यूरिया) चोरी-छिपे फैक्ट्रियों में चली जाती है। सीधे खाते में पैसा आने से खाद ‘बाजार भाव’ पर बिकेगी, जिससे उसकी तस्करी पूरी तरह रुक जाएगी।​
  2. क्वालिटी की आजादी: जब पैसा किसान के हाथ में होगा, तो वह घटिया खाद के बजाय अपनी पसंद की अच्छी कंपनी की खाद खरीदने के लिए स्वतंत्र होगा।​
  3. भ्रष्टाचार का खात्मा: डीलर या बिचौलियों द्वारा खाद की किल्लत पैदा कर ऊंचे दामों पर बेचने का खेल खत्म हो जाएगा।​
  4. उचित उपयोग: विशेषज्ञ मानते हैं कि जब किसान को खाद की असली कीमत (₹2400) पता चलेगी, तो वह उसका सीमित और सही इस्तेमाल करेगा, जिससे जमीन की सेहत भी सुधरेगी।

परेशानी: किसानों की चिंताएं और संभावित चुनौतियां

  1. जेब पर भारी बोझ: फिलहाल किसान को यूरिया की बोरी ₹266 में मिल जाती है। नई व्यवस्था में उसे पहले अपनी जेब से ₹2400-2500 देने होंगे। छोटे किसानों के पास एक साथ इतनी नकदी (Cash) जुटाना बड़ी चुनौती होगी।​
  2. सब्सिडी आने में देरी: जैसा कि गैस सब्सिडी के मामले में देखा गया है, कई बार तकनीकी कारणों से पैसा खाते में आने में महीनों लग जाते हैं। ऐसे में किसान अगली फसल के लिए खाद कैसे खरीदेगा?
  3. बैंकों के चक्कर: ग्रामीण इलाकों में आज भी बैंक दूर हैं। सर्वर डाउन होना या अंगूठे का निशान (Biometric) न मिलना किसानों के लिए सिरदर्द बन सकता है।
  4. किराएदार किसानों का क्या होगा?: भारत में लाखों किसान दूसरों की जमीन पर खेती करते हैं। अगर सब्सिडी ‘भू-स्वामी’ (जमीन के मालिक) के खाते में गई, तो असल खेती करने वाले किसान को भारी नुकसान होगा।

निष्कर्ष: अभी केवल ‘मंथन’ है, ‘आदेश’ नहीं अपने पाठकों को स्पष्ट कर देना चाहता है कि यह फिलहाल सरकार का एक प्रस्ताव और विचार है। अभी पुरानी व्यवस्था ही लागू है और खाद सस्ते दामों पर ही मिल रही है। सरकार विशेषज्ञों और किसान संगठनों से इस पर राय ले रही है ताकि कोई भी फैसला लेने से पहले किसानों के हितों की रक्षा की जा सके।

𝐁𝐇𝐈𝐒𝐌 𝐏𝐀𝐓𝐄𝐋

𝐄𝐝𝐢𝐭𝐨𝐫 𝐇𝐈𝐍𝐃𝐁𝐇𝐀𝐑𝐀𝐓 𝐋𝐈𝐕𝐄 𝐍𝐞𝐰𝐬
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